प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में, दिन को पवित्र संधिकाल—जैसे ब्रह्ममुहूर्त (संध्या), दोपहर और गोधूलि बेला—के अनुसार विभाजित किया जाता था। ये क्षण रुकने, आत्म-मंथन करने और अपने भीतर बैठी ईश्वरीय चेतना से जुड़ने के लिए होते थे।
लेकिन हमारे आधुनिक जीवन में, इन संध्याकालों पर स्क्रीन ने कब्जा कर लिया है।
दिनचर्या की लय (The Rhythm of Rituals) का अर्थ ऐसी तकनीक का निर्माण है जो इन संधिकालों का सम्मान करे। यह आपकी दैनिक साधना में बाधक नहीं बनती। सुबह और शाम के समय यह शांत हो जाती है, ताकि साधक स्क्रीन बंद कर सके, एक दिया जला सके और मौन ध्यान में बैठ सके।